काशी के लिए शास्त्रों में एक विशेष शब्द आता है
अविमुक्त क्षेत्र।
अक्सर लोग इसका अर्थ केवल इतना समझते हैं कि
भगवान शिव काशी को कभी नहीं छोड़ते।
लेकिन अविमुक्त क्षेत्र का अर्थ इससे कहीं अधिक गहरा और व्यापक है।

अविमुक्त का अर्थ क्या होता है?
‘अविमुक्त’ शब्द दो भागों से मिलकर बना है
अ (नहीं) और विमुक्त (छोड़ा हुआ)।
अर्थात
जिसे कभी छोड़ा न गया हो।
अविमुक्त क्षेत्र का अर्थ है
वह स्थान जिसे भगवान शिव ने कभी त्यागा नहीं।
काशी और भगवान शिव का शाश्वत संबंध
काशी को शिव की नगरी कहा जाता है।
मान्यता है कि शिव यहाँ केवल अतिथि नहीं,
बल्कि नित्य निवासी हैं।
शास्त्र कहते हैं कि
जब सृष्टि का प्रलय होता है,
तब भी काशी शिव की चेतना में सुरक्षित रहती है।
इसी कारण कहा गया है
काशी नष्ट नहीं होती, केवल लीन होती है।
क्या अविमुक्त क्षेत्र केवल भौगोलिक स्थान है?
नहीं।
अविमुक्त क्षेत्र केवल जमीन का टुकड़ा नहीं है।
इसका वास्तविक अर्थ है
चेतना की वह अवस्था जहाँ शिव का स्मरण कभी नहीं टूटता।
काशी उस अवस्था का बाहरी रूप है,
जहाँ यह चेतना सहज रूप से अनुभव की जा सकती है।
काशी में मृत्यु और अविमुक्त क्षेत्र का संबंध
अविमुक्त क्षेत्र होने के कारण
काशी में मृत्यु को विशेष माना गया है।
मान्यता है कि यहाँ देह त्याग के समय
भगवान शिव स्वयं जीव को
तारक मंत्र का उपदेश देते हैं।
यह इसलिए संभव है,
क्योंकि काशी में शिव की उपस्थिति
कभी विच्छिन्न नहीं होती।
काशी को आनंदवन क्यों कहा जाता है?
जहाँ शिव की चेतना होती है,
वहाँ भय नहीं हो सकता।
इसीलिए काशी को
आनंदवन भी कहा गया है
ऐसा वन जहाँ मृत्यु भी आनंद का कारण बन जाती है।
यहाँ जीवन और मृत्यु दोनों
शिव की लीलाएँ मानी जाती हैं।
अविमुक्त क्षेत्र हमें क्या सिखाता है?
- ईश्वर बाहर नहीं, भीतर है
- मृत्यु से डरना अज्ञान है
- स्मरण ही मुक्ति का मार्ग है
- जो छोड़ा नहीं गया, वही सत्य है
काशी हमें यह बोध कराती है कि
जब मन अविमुक्त हो जाए,
तो स्थान स्वयं मोक्ष बन जाता है।
क्या आज भी काशी अविमुक्त है?
हाँ।
समय, भीड़ और परिवर्तन के बावजूद
काशी की चेतना आज भी वैसी ही है।
जो व्यक्ति शांत मन से काशी में ठहरता है,
उसे यह अनुभव स्वयं हो जाता है।
अविमुक्त क्षेत्र का वास्तविक अर्थ
काशी को अविमुक्त क्षेत्र इसलिए कहा गया है,
क्योंकि यहाँ शिव का स्मरण
कभी टूटता नहीं।
यह केवल स्थान की विशेषता नहीं,
बल्कि चेतना की अवस्था है।
अविमुक्त क्षेत्र, शिव की काशी में मणिकर्णिका घाट का विशेष महत्व है।
इसीलिए कहा गया है
जो काशी को समझ लेता है,
वह संसार से बंधा नहीं रहता।